eid-ul-azha bakrid : 2021 bakrid men kyon di jati hai qurbani

इस्लाम धर्म में त्याग या क़ुर्बानी का विशेष महत्व है जैसा की हम सब जानते हैं की इस्लाम धर्म के मानने वालों को मुसलमान कहा जाता है इसका शाब्दिक अर्थ है वो इंसान जो अपने ईमान पर क़ायम रहे यानी मुसलसल- ईमान इस्लाम में एक ख़ुदा की इबादत करने का हुक्म दिया गया है और उस ख़ुदा की राह में अपना सब कुछ क़ुर्बान करना इस धर्म का सबसे बड़ा सिद्धांत है ईद के लगभग 70 दिनों के बाद दुनिया भर के सारे मुसलमान eid-ul-azha यानी बकरीद bakrid मानते हैं इस दिन वो क़ुर्बानी दिया करते हैं इस साल 2021 में बकरीद 21 जुलाई के दिन मनाई जाएगी आज हम जानेंगे की क्यों ज़रूरी है इस्लाम में क़ुर्बानी और क्या मान्यता है इस्लाम धर्म क़ुर्बानी के विषय में

क्यों मनाया जाता है बकरीद ईद-उल-अज़हा bakrid eid-ul-azha 2021

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इस साल 21 जुलाई के दिन ईद उल अज़हा बकरीद eid-ul-azha bakrid  का त्यौहार मनाया जाएगा इस दिन का महत्व ये है की इस दिन दुनिया भर के मुसलमान क़ुर्बानी दिया करते हैं इस्लाम में क़ुबानी का एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान है अब आप सोच रहे होंगे की बकरी की क़ुर्बानी दे कर क्या बड़ा काम किया जाता है इस दिन तो बात सिर्फ ये नहीं है इसके पीछे एक बहुत पुरानी घटना है जिससे शुरुवात हुई थी बकरीद की आइये जान लेते हैं क्या है पूरी घटना

बात कुछ ऐसी है की हज़रत इब्राहिम अलेह सलाम को इ इल्हाम (आकाशवाणी) हुई की वो अपना त्याग और समर्पण साबित करने के लिए ख़ुदा की राह में अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ को क़ुर्बान करें अब वो सोचने लगे की ऐसी कौन सी चीज़ है जो उन्हें सबसे ज़्यादा पसंद है दुनिया की कोई ऐसी चीज़ नहीं नज़र उनको आई जो उन्हें अल्लाह से ज़्यादा पसंद और प्यारी थी

अब उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था तब उनको ख्याल आया की उनकी पत्नी हाजरा और उनका एक बेटा जिनका नाम हज़रत इस्माइल है जो उन्हें जान से ज़्यादा प्यारे हैं और दोनों में उन्हें अपने बेटे से सबसे ज़्यादा प्यार है तब उन्होंने फैसला किया की वो अल्लाह की राह में अपने बेटे को क़ुर्बान कर देंगे

बेटे इस्माइल को कैसे किया राज़ी क़ुर्बानी के लिए

जब जिनका नाम हज़रत इस्माइल ने ये तय कर लिया की वो अपने बेटे हज़रत इस्माइल को क़ुर्बान कर देंगे अल्लाह की राह में तब उन्होंने अपन बेटे से कहा की उनको ऐसा एक इल्हाम (आकाशवाणी) हुई है जिसमे उन्हें ये हुक़्म दिया गया है की वो ख़ुदा की राह में अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ को क़ुर्बान करें और तुमसे ज़्यादा अज़ीज़ दुनियां में मेरे पास कोई चीज़ नहीं है ये सुन कर हज़रत इस्माइल ने कहा ये मेरे लिए फ़क़्र की बात होगी की मैं ख़ुदा की राह में क़ुर्बान हो जाऊं उन्होंने अपने पिता से कहा की वो ख़ुद क़ुर्बान होने के लिए तैयार हैं

क्या हुआ था क़ुर्बानी वाले दिन

जब जिनका नाम हज़रत इस्माइल ने अपने बेटे और अपनी पत्नी हाजरा को अल्लाह की राह में बेटे हज़रात इस्माइल को क़ुर्बान करने की बात कही तो दोनों इस बात के लिए तैयार हो गए राज़ी ख़ुशी हज़रत इस्माइल अपने पिता के साथ चल पड़े व्वो एक पहाड़ पर पहुंचे जहाँ दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था उन्होंने वही जगह सही समझी क़ुर्बानी के लिए जैसे ही वो तैयारी कर रहे थे शैतान ने आकर उन्हें भड़काने की कोशिश शुरू कर दी एक बार वो हज़रत इब्राहिम से कहता की आप ये क्या कर रहे हैं भला कोई अपने बेटे को क़ुर्बान करता है क्या दूसरी तरफ वो हज़रत इस्माइल से कहता कैसा बाप है तुम्हारा जो तुम्हे ही क़ुर्बान करना चाहता है

मगर दोनों अपने इरादों से नहीं हटे हज़रत इस्माइल ने वहां पड़े पत्थर उठाकर शैतान को मरना शुरू कर दिया उसके बाद शैतान वहां से भाग गया ये प्रथा आज भी हज के दौरान निभाई जाती है जिसे शैतान को कंकड़ों से मारा जाता है

उसके बाद हज़रत इस्माइल ने अपने पिता से कहा की आप अपनी और मेरी आँखों पर पट्टी बांध लीजिए कहीं ऐसा ना हो की आप मेरे चेहरा देख कर क़ुर्बानी का अपना ये अज़ीम फैसला छोड़ दें उसके बाद हज़रत इब्राहिम अलेह सलाम ने एक छुरी निकली जो वो अपने साथ ले गए थे उन्होंने जैसे ही अपने बेटे की गर्दन पर उस छुरी को चलाया तभी वहां अल्लाह के दूत हज़रत जिब्राइल आ गए उन्होंने बिजली की रफ़्तार से हज़रत इस्माइल को हटा कर वहां छुरी के निचे एक दुम्बे (भेड़) को रख दिया और हज़रत इब्राहिम से कहा की उनकी क़ुर्बानी अल्लाह ने क़ुबूल कर ली है एक तरह से ये हज़रत इब्राहिम की परीक्षा थी जिसमें वो सफल हुए थे

किसके लिए ज़रूरी है क़ुर्बानी

इस्लाम में क़ुर्बानी का बड़ा महत्व है ये हर उस मर्द और औरत को करना पड़ता है जिसके पास या तो 52 तोला चाँदी या उसके बराबर पैसे हों जो उस वक़्त बाजार की क़ीमत हो या साढ़े सात तोला सोना हो या उसके बराबर पैसे हों

 

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किस जानवर की क़ुर्बानी दी जा सकती है किसकी नहीं

आपका यक़ीनन कोई न कोई मुस्लिम दोस्त होगा आपने उसके मुँह से हमेशा सुना होगा की वो ये नहीं खा सकता क्योंकि ये हलाल नहीं है मगर आप ये नहीं जानते होंगे की उसका मतलब क्या है उसका मतलब ये है की इस्लाम ने कुछ जानवरों को खाने का हुक्म दिया हुआ है और कुछ को नहीं और उन्ही की क़ुर्बानी eid-ul-azha bakrid  के दिन भी दी जा सकती है जिनको खाने का हुक्म दिया हुआ है

अब सवाल ये है की कौन से जानवर की क़ुर्बानी जायज़ है तो इस्लाम के अनुसार उन सभी जानवरों की क़ुर्बानी दी जा सकती है जो शाकाहारी जीव होते हैं और जिनके खुर बीच से फटे हुए होते हैं इनमें बकरे, भैंस, भेंड़ आदि आते हैं उसी तरह मांसाहारी जीव जैसे शेर, बाघ, चीता, आदि सब इस्लाम में हराम हैं इनको नहीं खाया जा सकता इस्लाम के अनुसार ये हराम हैं 

हज कब और कहाँ किया जाता है

हज एक धार्मिक यात्रा है जो दुनिया भर के हर मुस्लिम को ज़िन्दगी में एक बार ज़रूर करनी पड़ती है इस यात्रा यानि हज करने के लिए हर साल मुस्लिम धर्म के मानने वाले मक्का शहर में इकठ्ठा होते हैं ये हर उस मुस्लिम पर एक फ़र्ज़ है जो की स्वस्थ हो और अपने हज के खर्चों को उठा सकता हो

इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से 12 वे महीने यानी ज़िल हिज्जाह के 8 वीं तारीख से लेकर 12 वीं तारीख तक हज की किया जाता है चूँकि इस्लामिक कैलेंडर में चाँद की स्तिथि को ध्यान में रखा जाता है और इसी से दिन महीनों की गणना की जताई है अगर आप इसको इंग्लिश कैलेंडर के हिसाब से देखेंगे तो आपको इसमें 11 दिन काम मिलेंगे इस लिए इसकी तारीख इंग्लिश कैलेंडर में बदलती रहती हैं 

इस्लाम धर्म में हज कको बहुत एहमियत दी जाती है मन जाता है की हज की शुरुवात हज़ारों साल पहले हुई थी जब इब्राहिम अलेह सलाम ने अपने बेटे की क़ुर्बानी के लिए अराफात पर्वत पर ले गए थे और जहाँ उनकी क़ुर्बानी खुदा ने क़ुबूल की थी हज जब खत्म हो जाता है तब लोग अपन सर मुंडवा लेते हैं और जानवरों की बलि दी जाती है इसके बाद ईद उल अज़हा बकरीद eid-ul-azha bakrid  का त्यौहार मनाया जाता है 

 

 

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