Allama Iqbal Biography in Hindi

Allama Iqbal | BIography of Allama Iqbal in Hindi

अक्सर लोगों के ख़्याल में आता है की, शायरी महज़ दिल आवारा मनचले जज़्बातों को लब्ज़ देने का एक हुनर है. और कुछ लोग ये सोचते हैं की, शायरी आशिक़, माशूक़, चाँद, सितारे, तन्हाई, जुदाई महज़ इन्ही सब के इर्द गिर्द घूमती रहती है. कुछ हद तक ये सही भी है मगर कुछ ऐसे भी शायर हुए हैं, जिन्होने अपनी शायरी से लोगों में इंकलाब पैदा कर दिया। उनका लिखा एक एक शेर गलियों में गुंजा है, नारा बन कर. उन्ही क्रांतिकारी शायरों के फेहरिस्त में जो पहला नाम आता है, वो है अल्लामा इक़बाल Allama Iqbal का  इन्होने जो ग़ज़ल या शेर लिखे वो कमाल के शेर हैं, जब वो इस्लामिक पृष्ट भूमि पर लिखते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे बंदा अपने खुदा से आमने सामने बैठकर बात कर रहा है, और जब उनके लिखे देशभक्ति के गीत पढे या सुने जाएँ तो ऐसा लगता है, जैसे एक एक शब्द नसों मे तेज़ाब बनकर दौड़ने लगता है.

कौन थे अल्लामा इक़बाल BIography of Allama Iqbal

अल्लामा इक़बाल Allama Iqbal की पैदाइश 9 नवम्बर 1877 के दिन सियालकोट पाकिस्तान (अविभाजित भारत ) में हुई थी. इनके वालिद का नाम शेख नूर मूहोम्मद और वालिदा का नाम इमाम बीबी था। घर की माली हालत उतनी अच्छी नहीं थी, बस गुज़रा हो जाता था. उनके वालिद ज़्यादा पढे लिखे नहीं थे, उनका काम दर्जी का था वो लोगों के कपड़े सिला करते और घर चलाया करते थे, मगर हाँ पढे लिखे नही थे मगर वो बहुत ही धार्मिक और सामाजिक व्यक्ति थे। वो हमेशा इबादत किया करते उनकी ज़िंदगी बस इन्हीं सब बातों में गुजरती रही, वहीं उनकी वालिदा भी काफी धार्मिक थीं। और खुद के हालात ठीक नहीं होने के बावजूद वो दूसरों की मदद किया करतीं, सबके सुख दुख में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया करतीं.

अल्लामा इक़बाल की शुरुवाती ज़िंदगी

allam iqbal biography in hindi

बात उस दौर की है, जब मूहोम्मद इक़बाल अल्लामा इक़बाल Allama Iqbal बन रहे थे. इक़बाल को उर्दू अरबी फारसी और साथ साथ अंग्रेज़ी भाषाओं में महारत हासिल थी, हालांकि उन्हे उर्दू का महान शायर माना जाता है. और शायरों की तरह उन्हे उतनी ज़्यादा तरजीह नहीं दी जाती भारत में, इसकी दो वजहें हैं, एक तो उनकी शायरी सबके समझने के लिए आसान नहीं थी, वो बारीक फारसी उर्दू और अरबी भाषाओं का इस्तेमाल किया करते थे अपनी शायरी में. और दूसरे ये की वो आम शायरी नहीं किया करते थे, जिसमे पढ़ने और सुनने वालों को आशिक माशूक़ की बातें नज़र आयें, वो एक इंकलाबी शायर थे, उनकी शायरी ज़िंदगी के फलसफ़ों से लबरेज हुआ करती थी। एक एक हरफ में कई कई माइने हुआ करते थे.

उनकी शुरुवाती पढ़ाई घर से शुरु हुई, जहां उन्होने उर्दू फारसी और अरबी की तालिम हासिल की। उसके बाद उन्होने लाहौर के सरकरी कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहां वो दर्शनशास्त्र (Philosophy) की पढ़ाई करने लगे वहाँ वो अपने प्रोफेसर सर थॉमस अर्नोल्ड से बहुत (प्रभावित) मुतासीर थे, उन्होने ने इक़बाल में पढ़ने की लालसा और उनकी लगन को देखते हुए, इक़बाल की आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने को कहा। इक़बाल ने उनकी बात मान ली और वो आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए, वहाँ उन्होने सन 1906 में Cambridge के Trinity College से Bachelor of Art की Degree ले ली और फिर Doctorate के लिए 1907 में जर्मनी के ludwig maximilian university of munich मे दाखिला ले लिया और PHD की Degree ली.

अल्लामा इक़बाल का पाकिस्तान लौटना

उस जमाने में PHD की Degree लेकर अल्लामा इक़बाल Allama Iqbal पाकिस्तान (अविभाजित भारत) लौटे सन 1908 में, और कुछ दिनों बाद ही लाहौर के एक सरकारी कॉलेज में पढ़ाने लगे, ज़िंदगी बड़े आराम से गुज़र रही थी और इसी दौर में पढ़ते पढ़ते उन्होने लाहौर के कोर्ट में कानून की Practice शुरू कर दी, मगर दिल उनका इन सब में लगता नहीं था। उनके अंदर साहित्य और शायरी की चिंगारी जलती रही, एक दिन फिर उन्होने ये कानून की सब किताबे ताक पर रख दीं और पूरी तरह से शायरी और साहित्य में डूब गए.

कश्मीरी पंडित थे इक़बाल के पूर्वज

कहा जाता है की, अल्लामा इक़बाल Allama Iqbal के दादा का नाम सहज राम सप्रू था. जो की एक कश्मीरी पंडित थे। जिन्होने इस्लाम कुबूल किया और पाकिस्तान जा कर लाहौर में बस गए थे. इस तरह इक़बाल का जन्म भले ही मुस्लिम परिवार में हुआ था, मगर उनका संबंध हिन्दू खानदान से था. इक़बाल ने मुस्लिम दर्शन को एक नया आयाम दिया और सारी ज़िंदगी उन्होने इस्लाम के उसूलों पर गुज़ार दी. हालांकि उन्होने भारतीय परंपरा का भी पूरा ख्याल रखा अपनी रचनाओं में, और काफी लिखा भी दरअसल शायर को किसी मजहब और किसी सरहद में नहीं बांटा जा सकता, वो एक तरह का रचीयता होता है। वो इस बात से फर्क नहीं करता की, वो किस धर्म किस शहर से तालुक रखता है. वो बस अपने विषय के बारे में सोचता है, और उसकी के इर्द गिर्द रहता. उसको रचता है. और यही वजह है की, इक़बाल ने जहां मुस्लिम धर्म की बात की, वहीं उन्होने भगवान राम का भी ज़िक्र किया है। उनका मानना था की, राम हिंदुस्तान के संस्कृति के प्रतीक हैं.

इक़बाल ने हिन्दी उर्दू फारसी और अरबी में कई सारे नगमे लिखे हैं, जिसकी वजह से न सिर्फ वो पाकिस्तान बल्कि हिंदुस्तान,अफगानिस्तान, ईरान, इराक़ और अरब देशों में काफी लोकप्रिय रहे. उन्हे इसलिए अल्लामा कहा जाने लगा था. अल्लामा का शाब्दिक अर्थ होता है विद्वान. पाकिस्तान ने उन्हे अपने राष्ट्रिय कवि का दर्जा भी दिया था.

इक़बाल को नाइट की उपाधि

अल्लामा इक़बाल Allama Iqbal इंग्लैंड चले गए थे, पढ़ाई के लिए वहाँ वो अंग्रेजों से काफी प्रभावित हुए। वहाँ रहते हुए उनके दिमाग पर अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो वाली नीति ने घर कर लिया, वो धीरे धीरे इस्लाम के मुख्य दर्शन से भटक गए और कट्टरवाद की ओर उनका झुकाव हो गया वो दौर था. जब अंग्रेजों की हुकूमत थी, हिंदुस्तान पर और सारा देश अपनी आज़ादी के लिए अंग्रेज़ी सरकार से लड़ रहा था। हाँ ये अलग बात थी की, कोई शांतिप्रिय तरीके से लड़ रहा था तो कोई उग्र तरीके लिए हुए लड़ रहा था. मगर सबका मकसद एक था कैसे भी करके देश को आज़ाद करवाना है। मगर अंग्रेज़ भी इतनी आसानी से हार मनाने वाले नहीं थे, वो भी अपनी जुगत में लगे हुए थे की, कैसे अपनी पकड़ हिंदुस्तान पर और मजबूत की जाए। जिसके लिए वो हिन्दू मुस्लिम एकता में सेंध लगा रहे थे, और कहीं कहीं कामयाब भी नज़र आ रहे थे। उनकी इसी चाल का शिकार बन गए, शायद अल्लामा इक़बाल जिसका नतीजा ये हुआ की, सन 1922 में अग्रेज़ी हुकूमत ने उन्हे नाइट की उपाधि दी, और उन्होने खुशी खुशी उसको स्वीकार कर लिया.

“तराना ए हिन्द” से “तराना ए मिल्ली” तक इक़बाल

इक़बाल एक सच्चे देश भक्त थे इसका किसी को कोई शक नहीं, उन्होने कई ऐसी ग़ज़लें लिखी जिसमें उनके देश भक्ति की लौ को महसूस किया जा सकता है. जब सन 1904 मे उन्होने लिखा था, “तराना ए हिन्द” तो वो ग़ज़ल एक एक क्रांतिकारी की ज़ुबान पर थे. आज भी वो ग़ज़ल दोहराई जाती है, हिंदुस्तान के कोने कोने में.

सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा

हुम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसीतान हमारा

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा

मगर जब उनके दिमाग़ में ये ख्याल आने लगे की मुस्लिमों के लिए एक अलग से राज्य होना चाहिए बस तब से ही वो भारतीयो के दिल से उतर गए। सन 1910 में उन्होने लिखा “तराना ए मिल्लि” इस ग़ज़ल में ये साफ साफ देखा जा सकता है की, जिस दौर में वो इस ग़ज़ल को लिख रहे थे, उनके दिमाग में क्या चल रहा था। आप भी देखिये उन्होने क्या लिखा।

“ऐ अर्ज-ए-पाक तेरी हुर्मत पे कट मरे हम,

है खूं तिरी रगों में अब तक रवां हमारा,

चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्तां हमारा,

मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा.”

अंग्रेज़ी सरकार के विरोधी इक़बाल

इक़बाल हमेशा से इंसान और इन्सानो के हक़ ही आवाज़ उठाई थी अपनी ग़ज़लों के जरिये. सार्वजनिक जीवन और राजनैतिक जीवन में चूंकि वो पश्चिमी और मध्यपूर्व के विद्वानों से काफी प्रभावित थे. उनके दिमाग में भी आज़ाद लोग और आज़ाद देश का सपना था। मगर अंग्रेज़ी सरकार अक्सर उनके इस ख्याल के सामने आकार खड़ी हो जाया करती थी। अपने ख्याल के हिसाब से उन्होने “अंजुमन ए हिमायत ए इस्लाम” की सदस्यता ले ली ताकि, वो किसी तरह इन्सानो के काम आ सके और उनके हक़ के लिए अपनी आवाज़ बुलंद कर सकें.

बाद के कुछ दिनों बाद इक़बाल का मुस्लिम राजनीति में कद बढ़ने लगा। ये वो दौर था जब प्रथम विश्व युद्ध की आँधी में पूरी दुनियाँ घिरी हुई थी, और भारत में भी उसकी आहटें आ रहीं थी, जिसको देखते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत ने हिन्दुस्तानी फ़ौजियों को इस आँधी में झोंक दिया था क्योंकि, हिन्दुस्तानी फौज उस वक़्त अंग्रेजों के हाथ में थी. मगर हुकूमत का ये फैसला इक़बाल को नापसंद गुज़रा, वो अंग्रेज़ी हुकूमत के इस फैसले के खिलाफ हो गए। और उन्होने इसके बारे में लिखा भी खूब और बोले भी खूब जहां जहां उन्हे मौका मिला. इसी दौरान वो खिलाफत आंदोलन से जुड़े और वहाँ उन्होने सक्रिय भूमिका निभाई। इन्ही दिनों वो मूहोम्मद आली जिन्ना के संपर्क में आए और उनकी ज़िंदगी में फिर एक नया बदलाव आ गया.

इक़बाल हमेशा से काँग्रेस के विरोधी रहे, वो काँग्रेस को हिंदुओं की पार्टी मानते थे. मुस्लिम लीग से भी उनका कई वजहों से मोह भंग होने लगा था सन 1920 में, जबकी सभी पार्टियों से उनका दिल भर गया था मगर उन्हे मूहोम्मद अली जिन्ना से विशेष लगाव रहा, वो उन्हे एक योग्य नेता मानते थे, और हमेशा उन्हे योग्य समझा हालांकि उस वक़्त मूहोम्मद अली जिन्ना लंडन में जा बसे थे.

इक़बाल और मुस्लिम जनता

एक दौर ये आया की, मुस्लिम लीग पार्टी जो थी वो बिखराव के कगार पर आ गई। और इक़बाल में कुशल नेतृत्व और प्रबंधन की विशेष शैली थी, जिसको देखते हुए उन्हे मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया। जैसे ही उन्हे चुना गया वो मुस्लिमों में एक लग किस्म की विचारधारा का निर्माण करने लगे वो वो चाहते थे की, मुस्लिमों के लिए एक अलग राज्य हो ऐसा माना जाता है की, इक़बाल ही वो इंसान थे, जिन्होने पहली बार धर्म के आधार पर मुस्लिमों के लिए अलग राज्य की मांग की थी, मगर उन्होने ये कभी नहीं कहा था की, मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाया जाए वो चाहते थे की, देश एक हो मगर एक ऐसा राज्य हो जहां मुस्लिम आबादी रहे, 29 दिसंबर 1930 को अपने एक महत्वपूर्ण भाषण में इकबाल ने अपने विचार रखे की, उत्तर-पश्चिमी हिन्दोस्तान के मुस्लिम बाहुल्य प्रांतों के लिए एक अलग राज्य बनाना चाहिए उन्हे ये अलग राज्य चाहिए था न की, अलग देश की मांग की थी.

उन्होने ये भी कहा की, “मैं पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर या ब्रिटिश साम्राज्य के बिना स्वतंत्र शासन के रूप में एक राज्य में समाहित देखना चाहता हूं.”

            उस जमाने में इक़बाल ने एक पत्रिका की शुरुवात की जिसका नाम था, तुलु ए इस्लाम ये पत्रिका मुस्लिम समाज के धार्मिक सांस्कृतिक और सामाजिक भावनाओ को  पेश करती थी, और इस पत्रिका ने पाकिस्तान के निर्माण में आगे चल कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मुस्लिम लीग के विचारों को प्रचारित और प्रसारित करने में भी इस पत्रिका ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। सन 1931 में जब लंदन में गोल मेज़ सम्मेलन हुआ तब मुस्लिम लीग भी शामिल हुई और इसके सदस्य के तौर पर मूहोम्मद इक़बाल भी इस सम्मेलन में शरीक हुए.

भारत में एक साथ दो दो आंदोलन चल रहे थे

इकबाल ने लड़खड़ाते हुए मुस्लिम लीग को सहारा दिया। उसको मजबूत कर दिया था, मगर बिगड़ती तबीयत की वजह से वो अब उस में ज़्यादा ध्यान नहीं दे पा रहे थे। जिसके बाद उन्होने मूहोम्मद अली जिन्ना से कहा की, वो अब भारत आ जाएँ और मुस्लिम लीग की कमान संभालें। और अंग्रेजों के सामने काँग्रेस का एक विकल्प पेश करें। उनकी इस बात को जिन्ना ने मान लिया, वो लंदन से वापस भारत लौट आए और आते ही उन्हे मुस्लिम लीग की कमान सौप दी गयी.

इधर इक़बाल की तबीयत दिन ब दिन बिगड़ी चली गई, उनके गले में संक्रमण हो गया था जो की अब बेकाबू हो गया था। और आखिरकार 21 अप्रैल 1938 के दिन उनकी मौत के साथ ही ख़त्म हुआ.

इधर मूहोम्मद अली जिन्ना बेकाबू हो गए, उन्होने इक़बाल के अलग राज्य की बात को दरकिनार कर अलग देश की मांग रख दी, और मुस्लिम लीग में इस बात को पुख्ता तौर पर कहने लगे की, उन्हे अलग देश चाहिए मुस्लिमों के लिए। मुस्लिम लीग का एक बड़ा नेता अब इस दुनियाँ से जा चुका था, जिसका जिन्ना ने भरपूर फ़ायदा उठाया और 1940 में अपने एक भाषण में जिन्ना ने अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा की, हमें मुस्लिमों के लिए एक अलग देश का निर्माण करना है। और उसके लिए हमें काम करना पड़ेगा अब भारत में एक ही वक़्त में दो आंदोलन चल रहे थे, एक तो देश को अंग्रेजों से आज़ाद करने का और एक था, एक अलग मुस्लिम देश बनाने का.एक लंबे इतेजार और कई हजारों कुर्बानियों के बाद देश आज़ाद हुआ, और जिन्ना की भी जीत हुई।अब भारत क दो टुकड़े हो चुके थे, एक हिंदुस्तान और एक पाकिस्तान.

एक अजीब विडम्बना थी ये की, 15 अगस्त 1947 को देश रात 12 बजे संसद भवन में ये ग़ज़ल गाई जा रही थी. “सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसीतान हमारा” और इसको लिखने वाला शायर कब का इस गुलिस्ताँ से जा चुका था.

अल्लामा इक़बाल की ग़ज़लें/ शायरी/शेर/नज़्म

उर्दू में लिखी आज तक की शायद ये सबसे ज़्यादा पसंद और दोहराई जाने वाली ग़ज़ल है ये ग़ज़ल अल्लामा इक़बाल ने बच्चों के लिए लिखी थी सबसे पहले इस ग़ज़ल को इत्तेहाद नाम की एक Weekly Magazine में छापी गई 16 अगस्त 1904 के Edition में फिर अल्लामा इक़बाल ने इसे बांग-ए-दरा में तराना-ए-हिन्दी के नाम से शामिल किया इस जगह जो आप हिन्दी शब्द देख रहे हैं उसका मतलब हिन्दी भाषा से नहीं है इक़बाल का मतलब हिन्दी से है हिंदुस्तान के रहने वाले लोगों से है ये भारत में राष्ट्रगीत के बाद सबसे ज़्यादा गायी जाने वाली देशभक्ति की रचना है इसकी प्रसिद्धि की एक बात ये है की सन 1950 के दहाई में मशहूर सितार बजाने वाले पंडित रवि शंकर ने इसको सुरों से पिरोया और लता मंगेशकर ने इसको अपनी आवाज़ से सजा दिया जिसके लिए दोनों को ही भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

 

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