imam husaain ki mazar

muharram kya hai | muharram ke mahina kyon hai khaas

हम में से बहुत से लोग हैं जो मुस्लिमों के त्योहारों के बारे में ठीक से नहीं जानते ऐसे ही एक महीना होता है मोहर्रम का अब आप सोच रहे होंगे की मुहर्रम Muharram तो मुस्लिमों के त्यौहार का नाम है तो आपको बता दे की ऐसा नहीं है मोहर्रम कोई त्यौहार नहीं बल्कि इस्लामिक कलैंडर का एक महीना है

हम hindeeka में हमेशा ये कोशिश करते हैंकि जब भी कोई विजिटर हम तक आये उसको उसके सारे सवालों के जवाब हम दे सकें ताकि वुसको कहीं और जाकर जवाब तलाशने की ज़रूरत ना पड़े हम आज हम बात करेंगे मुहर्रम की और जानेंगे की इस महीने में ख़ास बात क्या है और इसी महीने से इस्लामिक कलैंडर की शुरुवात होती है और क्या हुआ था इस महीने में की मुस्लिमों के लिए ये महीना ख़ास हो गया आगे पढेंगे..

कौन थे हज़रत इमाम हुसैन Who was Imam Hussain

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हज़रत इमाम हुसैन Imam Hussain का जन्म इस्लामिक कैलेंडर की हिसाब से 3 शाबान 4 हिजरी रोमन कैलेंडर के हिसाब से 8 जनवरी सन 626 ईस्वी में हुआ था इनके वालिद यानि पिता का नाम हज़रत अली है जो की इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा थे इनकी वालिदा यानी माता जी का नाम फातिमा है। फातिमा पैगम्बर मोहम्मद सलल्लाहो वस्सलम की बेटी हैं

हुज़ूर मोहम्मद साहब को इमाम हुसैन से बहुत मुहोब्बत थी वो कहा करते थे की मैं हुसैन से हूँ और हुसैन मुझसे जो हुसैन से प्यार करेगा वो मुझसे प्यार करेगा और वो कहते अल्लाह तू उससे प्यार कर जो हुसैन से प्यार करेगा 

हज़रत इमाम हुसैन ने 4 शादियां की थीं उनकी पत्नियों के नाम शहर बनो, उम्मे रुबाब, उम लैला और उम इशहाक था हज़रत की मृत्यु 54 साल की उम्र में 10 अक्टूबर सन 680 ईस्वी में करबला की लड़ाई में यज़ीद की फ़ौज से लड़ते हुए हुई थी

इमाम हुसैन साहब की मज़ार इराक़ के करबला Karbala शहर में है मोहर्रम के महीने में यहाँ लाखों लोग जाते हैं उनकी ज़ियारत करने के लिए

इस्लामिक कलैंडर क्या है Islamic Calendar

हिजरी यानी इस्लामिक कलैंडर Islamic Calendar की शुरुवात सामान्य कैलेंडर की तरह नहीं होती ईस्वी कैलेंडर में दिन नए दिन की शुरुवात रात 12 बजे से होती है जबकि इस्लामिक कलैंडर में नई तारीख की शुरुवात सूरज डूबने (मग़रिब) के वक़्त से होती है इस्लामिक कलैण्डर चाँद पर निर्धारित होता है इसमें भी 12 महीने होते हैं इसमें 29 और 30 दिन के महीने होते हैं इसलिए इस्लामिक कलैंडर में 354 दिन ही होते हैं साल भर में

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हिजरी सन की शुरुवात कब हुई थी

पैगम्बर हज़रत मोहम्मद सलल्लाहो वसल्लम को मक्का शहर छोड़कर मदीना जाना पड़ा था जिसके हिजरत कहा जाता है इसी शब्द हिजरत से हिजरी शब्द बना है मोहर्रम के महीने में ही ये हिजरत हुई थी। जब ये इस्लामिक कलैण्डर Islamic Calendar बना उस वक़्त दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उम्र फ़ारुख़ रज़ी अल्लाह ताला का ज़माना था लगभग 1442 साल पहले, हजरत अली रजि. और हजरत उस्मान गनी रजि. के सुझाव पर ही खलिफा हजरत उमर रजि.ने मोहर्रम को हिजरी सन का पहला माह तय कर दिया, तभी से विश्वभर के मुस्लिम मुहर्रम Muharram को इस्लामी नव वर्ष की शुरुआत मानते हैं।

Islamic Calendar में कौन कौन से महीने होते हैं

जैसा की हम जान चुके हैं की रोमन कैलेंडर की तरह Islamic Calendar में भी 12 महीने होते हैं और इसकी शुरुवात मुहर्रम Muharram से होती है आइये अब ये जान लेते हैं की कौन कौन से महीने होते हैं Islamic Calendar में

  1. मोहर्रम
  2. सफ़र
  3. रबी अल-अव्वल
  4. रबी अल थानी
  5. जमाद अल-अव्वल
  6. जमाद अल थानी
  7. रज्जब
  8. शअबान
  9. रमज़ान
  10. शव्वाल
  11. ज़ू अल क़ादा
  12. ज़ू अल हज्जा

इन सब 12 महीनों में दुनिया बाहर के मुसलमानों के लिए रमज़ान का महीना सबसे पवित्र होता है वो इस पुरे महीने रोज़े ( उपवास) रखते हैं और अल्लाह की इबादत में लगे रहते हैं 

क्या है मोहर्रम What is Mohorram 

इस्लामिक कलैंडर के हिसाब से मुहर्रम Muharram पहला महीना होता है 12 महीनों में से यानी दुनिया भर में इस्लाम धर्म को मानने वालों के लिए मुहर्रम Muharram पहला महीना होता है साल का।

क्या है मोहर्रम का इतिहास

हालांकि मुहर्रम Muharram इस्लामिक कैलेंडर में पहला महीना होता है मगर इसका जश्न नहीं मनाया जाता इसके पीछे एक ऐसी कहानी है जिसको सून कर ही आँखों में आंसू आ जाते हैं तो जश्न की क्या बात करे कोई आइये आगे जानते हैं क्या हुआ था मुहर्रम Muharram के महीने में

पैगम्बर हज़रात मोहम्मद साहब के नवासे ( बेटी के बेटों) और उनके साथियों की शाहदत के महीने के तौर पर याद किया जाता है मोहर्रम का महीना दरअसल शोक का महीना होता है एक तरफ ये शोक का महीना है तो दूसरी तरफ इस महीने में एक ख़ास घटना हुई थी वो घटना थी की पैगम्बर मोहम्मद साहब इसी महीने में पवित्र शहर मक्का से मदीना चले गए थे

जिसके लिए ज़्यादा याद किया जाता है मोहर्रम वो है शहादत हज़रात इमाम हुसैन और उनके 70 साथियों की ये दुनिया में एक मिसाल है बहादुरी सय्यम और बुराई के खिलाफ अच्छाई की। ये बात है सन 60 हिजरी की जब करबला इराक़ का एक शहर जहाँ यज़ीद ने अपने आप को इस्लाम का नया ख़लीफ़ा घोषित कर लिया वो इस्लामिक दुनिया और पुरे अरब में अपनी हुकूमत कायम करना चाहता था

आइये पूरी तफ्सील से बात करते हैं

सन 60 हिजरी का ज़माना था यज़ीद ने अपने आपको खलीफा घोषित केलिया मगर उसकी राह में सबसे बड़ी दिवार थे, पैगम्बर मोहम्मद साहब के नवासे हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन। ये बात यज़ीद अच्छी तरह से जानता था।

यज़ीद एक बहुत ही नालायक इंसान था उसमें हर किस्म की बुराइयां थीं इसके बावजूद वो चाहता था की हज़रत इमाम हुसैन उसकी ख़िलाफ़त को क़ुबूल कर लें मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया वो किसी भी तरह से इस्लाम को किसी ऐसे इंसान के हाथ में नहीं सौपना चाहते थे जो मुसलमान तो क्या इंसान कहलाने के लायक भी नहीं था

यज़ीद ने अब उन लोगों जो हज़रत इमाम हुसैन के साथ थे और इमाम हुसैन पर बहुत ज़ुल्म करना शुरू कर दिया ताकि वो उसकी ख़िलाफ़त क़ुबूल कर लें उसके ज़ुल्मों से परेशान होकर हज़रात ने अपना शहर मदिन छोड़ने का फैसला कर लिया कूफ़ा एक जगह है इराक़ में जहाँ के लोगों ने भरोसा दिलाया की वो उनकी देखरेख करेंगे मगर यज़ीद के डर से वो पीछे हट गए अभी हज़रत रस्ते में ही थे अपने खानदान और कुछ साथियों के साथ कूफ़ा जाने के लिए की यज़ीद के फौजियों ने उनका रास्ता रोक लिया करबला के तपते हुए रेगिस्तान में

ये तारीख थी 2 मोहर्रम की जब यज़ीदी फ़ौज ने उनका रास्ता रोका था रेगिस्तान में हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिवार के छोटे छोटे बच्चे औरतें और उनके साथी सब भूखे प्यासे रहने को मजबूर हो गए जितना कुछ था उनके पास सब खत्म हो चूका था यज़ीद के ज़ुल्म की इन्तहा ये थी की उसने वहां बह रही सिर्फ एक नदी जिसका नाम फरात नदी है उस के पानी पर भी पहरा लगवा दिया था वो तारीख थी 6 मुहर्रम की मगर फिर भी हज़रत इमाम हुसैन का सब्र यज़ीद नहीं तोड़ सका 

अब यज़ीद जान गया था की हज़रत इमाम हुसैन के सब्र का मुक़ाबला वो नहो कर सकता फिर उसने जंग का ऐलान कर दिया अब तारीख आई 9 मोहर्रम की शाम की नमाज़ के बाद हुज़र इमाम हुसैन ने अपने खेमों ( तम्बुओं) की मशाले बुझा दी और अपने साथियों को इकठ्ठा किया उन्होंने उनसे कहा की अब कभी भी जंग हमपर थोपी जा सकती है और वो नहीं चाहते की उनकी खातिर उनके साथी भी क़ुर्बान हो जाएँ

उन्होंने अपने साथियों से कहा की इसलिए खेमों की मशालें बुझा दी गई हैं की जिनको वापस जाना है वो चले जाएँ मैं उनसे कोई शिकायत नहीं करूँगा उन्होंने उनका इतना साथ दिया है वो भी बहुत है और वैसे भी यज़ीद उनकी खून का प्यासा है उन्होंने कहा वो उनको छोड़कर जाने वालों को कुछ नहीं करेगा कुछ देर बाद वापस मशालें रौशन की गईं मगर एक भी उनका साथी उनका साथ छोड़कर नहीं गया

दूसरे दिन यानी 10 मुहर्रम Muharram  के दिन जंग शुरू हो गई जिसकी शुरुवात यज़ीदियों ने की सुबह की नमाज़ पढ़ी जा रही थी हज़रत इमाम नमाज़ पढ़ा रहे थे उसी वक़्त ज़ालिमों ने तीर चलना उनपर शुरू कर दिया उनके कई साथी वहीँ नमाज़ पढ़ते पढ़ते शहीद हो गए और शाम होते होते पुरे उनके 72 साथी शहीद हो गए इन में हुज़ूर इमाम साहब के बेटे भतीजे रिश्तेदार दोस्त साथी सब शामिल थे

जब सब शहीद हो गए तब आखरी में बचे हज़रत इमाम हुसैन अब उन्होंने मैदान -ए- जंग में जाने का फैसला किया जब वो हाथ में तलवार लेकर मैदान में आये उनके सामने कोई नहीं टिक रहा था वो जिस तरफ से गुज़रते लाशों के ढेर लग जाते अकेले उन्होंने कइयों को मार गिराया मगर फिर वक़्त हुआ अस्र की नमाज़  (दोपहर की नमाज़) का यही मौका था यज़ीद की फ़ौज के पास इस शेर को काबू करने का जैसे ही वो सजदे में गए शिम्र नाम के एक यज़ीद के फौजी ने तलवार का ऐसा वार किया की उनका सर धड़ से अलग हो गया और ये सब हुआ उनकी बहन ज़ैनब की आँखों के सामने उनका सर भाले पर लगाकर यज़ीद के फौजी खुशियां मना रहे थे

ज़ैनब ने ही हुज़ूर की शहादत के बाद बाकि लोगों को संभाला क्योंकि अब उनके साथ कोई मर्द नहीं बचा था सिर्फ एक ज़ैनुल आबेदीन के अलावा क्योंकि वो बेहद बीमार थे बाद में यज़ीद के फौजियों में सभी औरतों और बच्चियों समेत ज़ैनुल आबेदीन को गिरफ्तार कर क़ैद में दाल दिया

अली असगर हज़रत इमाम हुसैन के बेटे की शहादत

हुज़ूर इमाम हुसैन के बेटे अली असगर की उम्र उस वक़्त सिर्फ 6 महीने की थी तपते रेगिस्तान में जब बड़ों की हालत प्यास और भूख की वजह से ख़राब हो रही थी तो वो मासूम कैसे रहा होगा सोचने की बात है अली असगर अपनी माँ के दूध पर ज़िंदा थे मगर मा का दूध भी उनको नसीब नहीं हो रहा था क्योंकि वो खुद भूखी प्यासी थीं अली असगर की प्यास से तड़प हूजीयर नहीं देख सके वो उन्हें अपनी गोद में लेकर उस नदी जिसपर यज़ीदी फ़ौज का पहरा था गए और उनसे कहा की इस मासूम को दो घूँट पानी नहीं मिला तो ये नहीं बचेगा

ये सब बात यज़ीद का एक जमील सिपाही सून रहा था उसने अपने एक साथी जिसका नाम हुर्मला था उसको हुक्म दिया की बाते क्या सून रहे हो उठाओ तीर और चला दो उस पर हुर्मला ने अपना धनुष संभाला और तीन नोकों वाला तीर चला दिया मासूम अली असगर पर उनके गले को चीरता हुआ तो मनहूस तीर हुज़ूर इमाम साहब के बाज़ुओं पर जा लगा उनके बाँहों में ही प्यासे अली असगर ने दम तोड़ दिया आसमान का कलेजा भी फट गया होगा यक़ीनन

हार कब भी इमाम जीत गए जीत कर भी यज़ीद हार गया आज यज़ीद का कोई नाम लेने वाला नहीं बचा मगर हज़रत इमाम हुसैन का नाम तब तक दुनिया में लिया जाता रहेगा एहतराम के साथ जब तब दुनिया में एक मुस्लिम भी बचा हुआ है

कैसे मनाया जाता है मोहर्रम

मुहर्रम Muharram के महीने में जो करबला (इराक) शहर में युद्ध हुआ था, जिसमें इमाम हुसैन साहब और उनके 72 साथियों को शहीद कर दिया गया था, जिसका सोग मुस्लिम समुदाय के लोग मानते हैं प्रतिकात्मक रूप से ये लोग हज़रत इमाम हुसैन का जनाज़ा ताजिये के शक्ल में निकलते हैं। और उसके साथ चलते हुए शिया समुदाय के लोग मातम करते हैं, ये ताजिये इमामबाड़े से निकल कर करबला तक ले जाया जाता है, इमामबड़ा और करबला अक्सर हर शहर में होते हैं, जहां मुस्लिम समुदाय के लोग रहा करते हैं। मोहोर्रम की 9 और 10 तारीख को दुनियाँ भर के मुस्लिम रोज़े रखते हैं इबादत करते हैं, और बात अगर की जाए ताजिये की तो ये इस्लाम की कोई परंपरा नहीं है, बल्कि कई मुस्लिम बुद्धिजीवी इसको इस्लाम के खिलाफ मानते हैं। ताजिये सिर्फ भारत में निकले जाते हैं ये एक सम्पूर्ण भारतीय परंपरा है। 10 आशूरा यानी मोहर्रम की 10 तारीख के दिन हज़रत इमाम हुसैन शहीद हुए थे इसलिए इस दिन मस्जिदों में विशेष तकरीरें होती हैं 

जानिए क्यों मनाई जाती है बकरीद 

Muharram 2022 मे कब मनाई जाएगी 

इस्लामिक कैलेंडर (Islamic Calendar) के पहले महीने का नाम मोहर्रम है. भारत में मोहर्रम महीने की दसवीं तारीख को मनाया जाता है. यानी इस बार भारत में मोहर्रम का त्योहार 8 या 9 अगस्त को मनाया जा सकता है. मोहर्रम जिसे ज्यादातर लोग एक त्योहार के रूप में जानते हैं, ये एक हिजरी कैलेंडर (Hijri Calendar) के पहले महीने का नाम है. इस्लाम में 4 महीने हैं जो बेहद पवित्र माने जाते हैं. उनमें से एक महीना मोहर्रम का भी है. मोहर्रम महीने के दसवें दिन को आशूरा कहते हैं. आशूरा के दिन ही भारत में मोहर्रम का त्योहार मनाया जाता है. इसी महीने इस्लामिक नया साल होता है. 

ताजिया क्यों बनाये जाते हैं क्या है ताजिये का इतिहास

tajiya kyon banate hain

इतिहास में एक बादशाह हुआ उसका नाम था तैमूर लंग वो एक बहुत ही महत्वाकांशी बादशाह था। वो चाहता था की, सारी दुनियाँ पर उसका राज हो तैमूर बरला वंश का तुर्की बादशाह था। वो मुस्लिमों के एक समुदाय जिसे शिया कहते हैं से आता था। मात्र 13 साल की उम्र में वो चुगताई तुर्कों का सरदार बन गया था। तैमूर सन 1398 में भारत आया वो अफगानिस्तान फारस मेसोपोटामिया आदि देशों से होता हुआ भारत आया था तैमूर लंग एक तुर्की शब्द है जिसका अर्थ होता है तैमूर लंगड़ा वह दाएं हाथ और दाए पांव से पंगु था।

चूंकि तैमूर शिया मुस्लिम था, तो वो हर साल मुहर्रम Muharram के महीने में (करबला ) इराक़ जाया करता था इबादत के लिए। मगर एक बार ऐसा हुआ की, वो बहुत बीमार हो गया और वो सफर करने के लायक नहीं बचा। हकीमों ने सख़्त हिदायत दे दी की आप अब सफर नहीं कर सकते, तैमूर इस बात से बहुत बेचैन रहने लगा क्योंकि मूहोर्रम का महिना आने वाला था, और वो हर साल इस महीने में करबला (इराक) जाया करता था।

उसके कुछ चुनिन्दा दरबारी थे, जिन्हे अपने बादशाह की ये हालत देखकर बहुत बुरा लग रहा था। वो चाहते थे की, तैमूर किसी तरह खुश हो जाए। जिसके लिए उन्होने एक तरकीब सोची, उन्होने कुछ कारीगरों को बुलाया और उनसे इराक के कर्बला में बने इमाम हुसैन के रोजे (कब्र) की प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया।

कारीगरों ने बांस कमचियों से हज़रत इमाम हुसैन के रोजे (कब्र) जैसा एक ढांचा बनाया, जिसको उन्होने फूलों और रंगीन कपड़ों से सजाया। इस ढांचे को नाम दिया गया ताजिये का जिसको पहली बार तैमूर के महल में 801 हीजरी में रखा गया।

 तैमूर के इस ताजिये को देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आने लगे तैमूर क्योंकि बादशाह था, इसलिए उसको सब खुश करना चाहते थे। जिसके लिए सभी रियासतों में ताजिये का निर्माण होने लगा भारत में जीतने शिया नवाब थे, सबने ये परंपरा शुरू कर दी। तब से लेकर आज तक भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ताजिये की परंपरा शुरू हो गई।और हर साल ताजिये निकले जाते हैं और मातम किया जाता है मुहर्रम Muharram के महीने में।

 

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मुहर्रम Muharram से जुडी कुछ अन्य बातें F&Q

क्या है मुहर्रम ?

इस्लामिक कलैंडर के हिसाब से मुहर्रम Muharramपहला महीना होता है 12 महीनों में से यानी दुनिया भर में इस्लाम धर्म को मानने वालों के लिए मुहर्रम Muharram पहला महीना होता है साल का।

कौन थे हज़रत इमाम हुसैन ?

हज़रत इमाम हुसैन Imam Hussain का जन्म इस्लामिक कैलेंडर की हिसाब से 3 शाबान 4 हिजरी रोमन कैलेंडर के हिसाब से 8 जनवरी सन 626 ईस्वी में हुआ था इनके वालिद यानि पिता का नाम हज़रत अली है जो की इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा थे इनकी वालिदा यानी माता जी का नाम फातिमा है। फातिमा पैगम्बर मोहम्मद सलल्लाहो वस्सलम की बेटी हैं

यज़ीद कौन था ?

यज़ीद एक बहुत ही नालायक इंसान था उसमें हर किस्म की बुराइयां थीं इसके बावजूद वो चाहता था की हज़रत इमाम हुसैन उसकी ख़िलाफ़त को क़ुबूल कर लें मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया वो किसी भी तरह से इस्लाम को किसी ऐसे इंसान के हाथ में नहीं सौपना चाहते थे जो मुसलमान तो क्या इंसान कहलाने के लायक भी नहीं था

ताजिये का क्या इतिहास है ?

ताजिये को पहली बार तैमूर के महल में 801 हीजरी में रखा गया

मुहर्रम 2022

भारत में मोहर्रम महीने की दसवीं तारीख को मनाया जाता है. यानी इस बार भारत में मोहर्रम का त्योहार 8 या 9 अगस्त को मनाया जा सकता है. मोहर्रम जिसे ज्यादातर लोग एक त्योहार के रूप में जानते हैं, ये एक हिजरी कैलेंडर (Hijri Calendar) के पहले महीने का नाम है. इस्लाम में 4 महीने हैं जो बेहद पवित्र माने जाते हैं. उनमें से एक महीना मोहर्रम का भी है. मोहर्रम महीने के दसवें दिन को आशूरा कहते हैं

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