Ajmer sharif Dargah in HIndi | Khwaja Garib Nawaz

राजस्थान के अजमेर जिले में विश्वप्रसिद्ध सूफी हज़रत ख्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह है जिसे अजमेर शरीफ दरगाह Ajmer sharif Dargah के नाम से भी जाना जाता है जिसका इतिहास लगभग 900 साल पुराना बताया जाता है मगर अब महाराणा प्रताप सेना ने इस दरगाह शरीफ के शिव मंदिर Shiv Mandir होने का दावा किया है जिस एक नए विवाद का रास्ता नज़र आ रहा है इस संगठन ने राजस्थान के मुख्यमंत्री और केंद्र को भी एक पत्र लिख कर इसकी जांच करने का आग्रह किया है आज इस आर्टिकल के ज़रिए हम जानेंगे की कौन थे हज़रत ख्वाजा ग़रीब नवाज़ Hazrat Khwaja Gharib Nawaz और क्या है इतिहास अजमेर की दरगाह History of Ajmer Sharif का और क्या है ये नया विवाद

अजमेर के हज़रत ख्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह पर क्या विवाद है ?

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जैसे एक आंधी आई हुई है देश में कभी ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर तो कभी क़ुतुब मीनार को तो कभी मथुरा के शाही मस्जिद को तो अब नया एक विवाद है विश्वप्रसिद्ध सूफी हज़रत ख्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह को लेकर एक संगठन जिसका नाम महाराणा प्रताप सेना है इसके संस्थापक राजवर्धन सिंह परमार ने दावा किया है की अभी जहाँ ये दरगाह है वहां पहले शिव मंदिर हुआ करता था जिसकी जांच के लिए संगठन ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ राष्ट्रपति राज्यपाल और केंद्र सरकार को भी एक पत्र लिखा है

इस पत्र में उन्होंने कुछ तस्वीरें भेजीं है और उसके ज़रिए ये दावा किया है अजमेर की दरगाह Ajmer sharif Dargah की खिडकियों पर स्वस्तिक के निशान है जिसका मुस्लिम इमारतों में इस्तेमाल नहीं किया जाता

अजमेर शरीफ दरगाह

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जैसी आस्था 12 वीं शताब्दी में थी अजमेर शरीफ के दरगाह Ajmer sharif Dargah को लेकर आज भी उस आस्था में कहीं कोई कमी किसी के भी नहीं है हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती Hazarat Khwaja Moinuddin Chishti की ये दरगाह है जिन्हें शहंशाहे हिन्दुस्तान भी कहा जाता है साथ ही इनको बड़े अदब और इज्ज़त के साथ ग़रीब नवाज़ भी कहा जाता है क्यों की इनके दरबार में ग़रीब आमिर हिन्दू मुस्लिम छोटे बड़े किसी भी चीज़ का कोई भेद नहीं है

क्या बादशाह अकबर Akabr क्या भारत और अन्य देशों के प्रधानमंत्री सभी इनकी दरगाह पर चादर चढ़ते हैं और सर झुकाते हैं और अपनी मन की मुरादें पाते हैं

अकबर संतान सुख के लिए इनके दरबार में नंगे पांव पैदल चल कर आया था और आज भी यहाँ लगभग 20 हज़ार लोग रोजाना ज़ियारत (दर्शन) के लिए आते हैं राजस्थान की राजधानी जयपुर से 145 किलोमीटर दूर अजमेर में हैं इनकी दरगाह जहाँ संगेमरमर की गुबंद के निचे इनकी कब्र शरीफ है जिसकी ज़ियारत की जाती है इसी दरगाह में और भी 8 कब्रें हैं जो इन्ही के खानदान वालों की है

कौन थे ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ?

इतिहासकारों का ऐसा मानना है की ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का जन्म 537 हिजरी में यानी 1143 ई. में पूर्वी पर्शिया के सिस्तान में हुआ था वहीँ कुछ अन्य इतिहासकारों का मानना है की इनका जन्म इरान के इस्फहान शहर में हुआ था इनके माता पिता की जानकारी उपलब्ध नहीं है

ये महज़ 9 साल की उम्र में हाफ़िज़ -ए-क़ुरान (कंठस्त) हो गए थे इनकों विरासत में एक बगीचा मिला था जिसे बेचकर उन्होंने गरीबों में दान कर दिय और ख़ुदा के राह में निकल पड़े थे उनके पीर (गुरु) हज़रत ख्वाजा उस्मान हरुनी रहमतुल्लाह अलैह के साथ वो 20 सालों तक रहे इन सैलून में वो अपने पीर का सारा सामान अपने कन्धों पर लाद कतर उनके साथ घूमते फिरते और लोगों को ख़ुदा का पैगाम सुनते सुनते रहते उन्होंने पैदल ही 51 बार हज किया था

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती भारत कब आये थे ?

इतिहासकारों का मानना है की 52 साल की उम्र में हज़रत मोईनुद्दीन हसन चिश्ती Hazrat Khawaja Moinuddin Hasan Chishti भारत तशरीफ़ लाये 587 हिजरी यानी 1192 ई. में वो समय था जब दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान Prithviraj Chauhan का शासन था और मुहोम्मद गौरी Muhommad Gauri के साथ उनका युद्ध अभी समाप्त ही हुआ था मुहोम्मद गौरी अपनी बची हुई सेना के साथ वापस गजनी लौट रहा था ऐसा कहा जाता है की मुहोम्मद गौरी की जब रास्ते में ख्वाजा से मुलाक़ात हितो उसने उनसे कहा की अभी आप दिल्ली ना जाएँ अभी आपका वहां जाना सुरक्षित नहीं है तब ख्वाजा ने गौरी को ये जवाब दिया की तुम लौट रहे हो क्योंकि तुमने तलवार का सहारा लिया और तुम्हरी मंशा राज करने की थी मैं जा रहा हूँ अल्लाह का नाम लेकर और मेरी मंशा अल्लाह का और शांति का पैगाम देना है ये कहकर ख्वाजा दिल्ली की ओर बढे कुछ दिन दिल्ली में बिता कर वो अजमेर चले गए

चिश्ती का क्या मतलब होता है ?

चिश्त एक शहर का नाम है इरान में यहाँ अबू इशहाक सामी ने चिश्तिया घराने की शुरुवात की थी इस शहर के नाम पर ही चिश्तिया सिलसिला या चिश्तिया घराना या चिश्तिया तरीका का नाम पड़ा ये ईश्वर तक पहुँचाने का अध्यात्मिक तरीका है इस तरीके में ईश्वर अल्लाह का सन्देश आसान और गाकर लोगों तक पहुँचाया जाता है जिसमें क़व्वाली समाख्वानी शामिल की जाती है

ईश्वर तक पहुँचाने का चिश्तिया तरीका अभी भारत तक नहीं पहुंचा था ये हज़रत मोईनुद्दीन चिश्ती के साथ ही भारत आया चूँकि भारत में शुरू से आधयात्म का मार्ग ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रचलित था तो यहाँ लोगों ने इस परंपरा को हाथों हाथ लिया शुरू में लोगों और राजाओं ने इसका विरोध किया मगर धीरे धीरे उन्होंने भी इसको अपना लिया और कहा जाता है की इस्लाम भी उस वक़्त तेज़ी से फैला भारत में

हज़रत मोईनुद्दीन चिश्ती और अकबर

बादशाह अकबर की सबसे पसंदीदा जगह थी अजमेर की दरगाह इसकी वजह ये ही शादी के सालों बाद भी अकबर और जोधा बाई की कोई संतान नहीं थी अकबर इस वजह से बहुत परेशान रहा करता था वो एक बार ज़ियारत करने के लिए अजमेर आया जहाँ उसने मन्नत मानी की अगर उसके घर लड़का हुआ तो वो अगर से अजमेर पैदल नंगे पांव चलकर आएगा और चादर चढ़ाएगा

कुछ दिनों में ही अल्लाह ने अकबर की ये मुराद पूरी कर दी और अकबर और जोधा बाई को पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम जहाँगीर था, बच्चे के जन्म के बाद सन 1570 में अकबर नंगे पैर 437 किलोमीटर पैदल चल कर अजमेर ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के दरबार में पहुंचा था

अजमेर शरीफ की दरगाह का निर्माण कब हुआ था ?

हज़रत मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जो अजमेर में है उसका निर्माण 1465 ई. में सुलतान गयासुद्दीन खिलजी ने करवाया था इस दरगाह में और भी बहुत सारे दार्शनिक स्थल हैं जिनका निर्माण भी अलग अलग समय में अलग अलग लोगों ने करवाया था इनमें से मुख्य हैं

  • निज़ाम गेट
  • दरवाज़ा नक्कारखाना
  • जन्नती दरवाज़ा
  • चार यार की मज़ार
  • बुलंद दरवाज़ा
  • सेहन का चराग
  • अकबरी मस्जिद

निज़ाम गेट – अजमेर दरगाह शरीफ के चार दरवाज़े हैं उनमे से सबसे बड़ा और सबसे खुबसूरत दरवाज़ा है निज़ाम गेट इसकी ऊंचाई 70 फीट और चौड़ाई 24 फीट की है इसको हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने बनवाया था

दरवाज़ा नक्कारखाना – ये दरवाज़ा नक्कारखाना शाहजहानी दरवाज़े के नाम से जाना जाता है दरबार शरीफ के चार दरवाज़ों में से ये भी एक महत्वपूर्ण दरवाज़ा है जिसे मुग़ल शासक शाहजहाँ ने बनवाया था इसमें शाही ज़माने के कारीगरी के कम्मल को देखा जा सकता है जोकि बेहद खुबसूरत है

जन्नती दरवाज़ा – दरगाह शरीफ के पश्चिम दिशा की ओर खुलने वाला बेहद खुबसूरत चांदी की पोलिश किया हुआ ये दरवाज़ा है जो ईद के दिन और उर्स के मौके पर ही सिर्फ 4 दिन खोला जाता है

चार यार की मीनार – अजमेर शरीफ दरगाह में एक जमा मस्जिद भी है जिसके पास ही एक बड़ा सा कब्रिस्तान भी है जहाँ बड़े बड़े फकीरों आलिमों फाज़िलों की भी कब्र मौजूद है साथ ही उन चार फकीरों की भी कब्रें मौजूद है जो हज़रत मोईनुद्दीन चिश्ती के साथ भारत आये थे और यहीं के हो के रह गए इसलिए इसे चार यार की मीनार कहा जाता है यहाँ भी लोग हर साल दर्शन करने आते हैं

बुलंद दरवाज़ा – अजमेर शरीफ के सभी दरवाज़ों से सबसे बड़ा दरवाज़ा है बुलंद दरवाज़ा इसका निर्माण महमूद खिलजी ने करवाया था हर साल उर्स के मौके पर इस पर अलम शरीफ (ध्वज) लगाया जाता है

सेहन का चराग – अजमेर शरीफ में वैसे तो देखने के लिए बहुत कुछ है उन्हीने में से है सेहन की चराग ये चराग पुराने ज़माने के पीतल से बनी हुई है जो एक बड़े से गुबंद के निचे रख हुआ है

अकबरी मस्जिद – इस मस्जिद का निर्माण बादशाह अकबर ने करवाया था जब उसे इस दरगाह शरीफ की दुवाओं के बदले पुत्र रत्न की प्राप्ति थी उस बेटे का नाम जहाँगीर रख गया गया था

जानने के लिए की क्यों मनाई जाती है ईद क्लिक कीजिये

अजमेर शरीफ का उर्स कब होता है ?

हर साल इस्लामिक कैलंडर के हिसाब से रज्जब माह की पहली तारीख से शुरू हटा है उर्स पाक अजमेर शरीफ का और छठवीं तारीख तक चलता है

कैसे मनाया जाता है उर्स पाक अजमेर शरीफ में ?

उर्स पाक मनाने की परंपरा अजमेर शरीफ में लगभग 800 सालों से भी ज़्यादा से चली आ रही है इस मौके पर हर साल देश विदेश के श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ आता है इस हुजूम में ना हिन्दू होते हैं ना मुसलमान न सिख न इसी न जैन ना बोद्ध ना ही कोई अन्य धर्म जाती के लोग यहाँ सिर्फ और सिर्फ श्रद्धालु होते हैं सभी धर्मों और जातियों के लोगों की अटूट आस्था का अटूट केंद्र है अजमेर शरीफ का ये दरगाह

6 दिन का उर्स पाक हर साल मनाया जाता है यहाँ पर इस मौके पर दरगाह शरीफ में सेवा करने वाले ख़ादिम अपने बैठने की जगह (गद्दी) के साथ एक विशेष गद्दी स्थापित करते हैं और उसको फूलों से सजाते हैं इसे वो हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की गद्दी का प्रतिक मानते हैं और इसकी इबादात करते हैं दुवाएं मांगते हैं बहुत से इस गद्दी पर फूओल चढाते हैं इत्र लगाते हैं ये गद्दी विशेष तौर पर ऊर्स के समय ही नज़र आती है उर्स मुबारक खत्म होने के बाद इस गद्दी को हटा लिया जाता है फिर अलगे साल इस गद्दी को स्थापित किया जाता है

अजमेर शरीफ दरगाह का लंगर

अजमेर में उर्स के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं तो उनके खानेपीने का इंतज़ाम भी यही दरगाह शरीफ में ही किया जाता है उर्स के दिनों में दरबार में सिर्फ शाकाहारी भोजन प्रसाद के तौर पर श्रधालुओं में वितरित किया जाता है लंगर का सारा काम अंजुमन संस्था के जिम्मे होता है ऐसे बहुत से श्रद्धालु होते हैं जो अपनी मन्नत पूरी होने पर व्वाहन पकवान पक्व्वाते हैं और अन्य श्रधालुओं में वितरित करवाते हैं

क्या आप जानते है क्या होता है हिजाब क्लिक कीजिये

बड़ी और छोटी देग

इतनी बड़ी संख्या में लोग आते हैं उर्स के दिनों में अजमेर और उनके खाने की व्यवस्था करना एक बात है और उनका खाना बनना एक अलग बात बादशाह अकबर ने दरगाह शरीफ को एक बड़ी से देग पेश की थी जिसकी क्षमता लगभग 4800 किलोग्राम की है और छोटी देग बादशाह जहाँगीर ने भेंट की थी जिसकी क्षमता लगभग 2240 किलोग्राम की है इसके बाद भी कई सारे बर्तेअनों का इस्तेमाल किया जाता है तब कहीं जाकर सभी लोगों में प्रसाद का वितरण हो पाता है

देगों के लिए लगती हैं बोलियाँ

ऐसा नहीं है की किसी की कोई मन्नत पूरी हुई हो या फिर ऐसे ही कोई वहां प्रसाद वितरित करवाना चाहता हो तो उसको तुरंत ये देग मिल जायेंगे बनवाने के लिए प्रसाद कई कई साल की वेटिंग होती है जब जिसका नम्बर आता है तब ही उसको देग मिल सकती है साथ ही इन देगों को लेने के लिए बोलियाँ लगाईं जाती हैं जोकि करोड़ों रुपयों तक होती हैं

अगर कोई श्रद्धालु उर्स के अलावा भी किसी समय प्रसाद बनवाकर बंटवाना चाहता है तो उसको बड़ी देग के लिए 1 लाख 50 हज़ार तक और छोटी देग के लिए 60 हज़ार से 80 हज़ार तक की रकम जमा करनी होती है

इन बोलियों से जो रकम जमा होती है उसका इस्तेमाल ग़रीब बच्चों के इलाज उनकी पढाई लिखाई औउर अन्य सामाजिक कार्यों में किया जाता है

कैसे पहुंचा जा सकता हैं अजमेर शरीफ ?

अगर आप भी अजमेर शरीफ जाना चाहते हैं तो आप ट्रेन और फ्लाइट दोनों से जा सकते हैं सबसे नजदीकी रेल्वे स्टेशन अजमेर हैं यहाँ से अआप ऑटो टेक्सी की मदद सेदरगाह तक जा सकते है

अगर आप हवाई रास्ते से अजमेर शरीफ जाना चाहते हैं तो सबसे नजदीकी एअरपोर्ट जो आपको मिलेगा वो जयपुर एअरपोर्ट है जहाँ से अजमेर शरीफ दरगाह सिर्फ 145 किलोमीटर दूर है जिसके लिए आप ट्रेन और टैक्सी का सहारा ले सकते हैं

अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़े अन्य सवाल

अजमेर शरीफ दरगाह कहाँ है ?

अजमेर शरीफ दरगाह राजस्थान की राजधानी जयपुर से 145 किलोमीटर दूर अजमेर शहर में हैं

अजमेर शरीफ दरगाह कितना पुराना है ?

अजमेर शरीफ दरगाह का इतिहास लगभग 900 पुराना है

अजमेर शरीफ दरगाह का निर्माण किसने करवाया था ?

हज़रत मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जो अजमेर में है उसका निर्माण 1465 ई. में सुलतान गयासुद्दीन खिलजी ने करवाया था

क्या अजमेर शरीफ दरगाह में हिन्दू जा सकते हैं ?

हाँ यहाँ हिन्दू , मुस्लिम , सिख इसाई सभी धर्मों और जातियों के लोग जा सकते हैं

हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन कहाँ के रहने वाले थे ?

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का जन्म 537 हिजरी में यानी 1143 ई. में पूर्वी पर्शिया के सिस्तान में हुआ था वहीँ कुछ अन्य इतिहासकारों का मानना है की इनका जन्म इरान के इस्फहान शहर में हुआ था

अजमेर शरीफ में उर्स कब होता है ?

हर साल इस्लामिक कैलंडर के हिसाब से रज्जब माह की पहली तारीख से शुरू हटा है उर्स पाक अजमेर शरीफ का और छठवीं तारीख तक चलता है

हज़रत मोईनुद्दीन हसन चिश्ती भारत कब आये थे ?

इतिहासकारों का मानना है की 52 साल की उम्र में हज़रत मोईनुद्दीन हसन चिश्ती भारत तशरीफ़ लाये 587 हिजरी यानी 1192 ई. में वो समय था जब दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान का शासन था

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