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उर्दू क्या भारतीय भाषा है क्या है इसका इतिहास

उर्दू भाषा की उत्पत्ति कब हुई

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history of Urdu

बोलने में शहद सा एहसास सुनने में चाशनी सी मिठास ऐसी ज़बान है उर्दू Urdu आइये जान लेते है क्या है उर्दू का इतिहास अरबी, फ़ारसी, और हिंन्दी भाषाओँ से मिलकर इसका जन्म हुआ है। उर्दू शब्द तुर्की भाषा से लिया गया एक शब्द है जिसका अर्थ होता है वो शिविर जहाँ, राजा महाराजा रहते हों यानी शाही तम्बू। तुर्क जब भारत आये तो वो अपने साथ इस शब्द को ले आये इसका इतिहास अगर देखा जाये तो लगभग 12 वी शताब्दी के आस पास इस भाषा का चलन बढ़ा उर्दू के शुरुवाती जानकारों में जो सबसे पहला और बड़ा नाम मिलता है वो है आमिर खुसरो का। जिनका जन्म 1253 ईसवी का माना जाता है, उन्होंने इस भाषा में ग़ज़लें शेर मुहावरे आदि लिखीं और इस तरह से इसका फैलाव होता चला गया।

उर्दू को किस किस नाम से जाना जाता है

उर्दू का इतिहास बहुत पुराण है भारत में उर्दू का जन्म 12 शताब्दी के दौर को माना जाता है, उस समय इस भाषा का प्रचलित नाम उर्दू नहीं बल्कि हिंदवी था चूँकि, इसके बोलने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ी और अलग अलग राज्यों में बोली जाने तो इसके अलग – अलग नाम भी होने लगे जैसे ज़बान – ए – हिन्द, रेख़्ता, ज़बान – ए – देहली, हिंदी, गुजरी, दक्कनी, ज़बान – ए – उर्दू – ए – मुअल्ला और उर्दू ।

उम्मीद है आपको ये जानकारी पसंद आ रही होगी आगे पढ़ते रहिये ज़्यादा जानकारी के लिए

कहाँ कहाँ बोली जाती है उर्दू

उर्दू जुबां भारत में हिंदी अरबी फारसी शब्दों के मिलन से बनी है, भारत के उत्तरी राज्यों मध्य भारत और दक्षिण में मुख्यतः बोली जाती है. भारत में 22 भाषाओँ  को राष्ट्रिय भाषा का दर्जा मिला हुआ है उसमें से उर्दू भी एक भाषा है. इसके साथ हमारे पडोसी मुल्क पाकिस्तान में ये आधिकारिक राष्ट्रिय भाषा है, वहां स्कूलों में सरकारी काम काज में हर जगह इस भाषा का प्रयोग होता है.

पहले भारत  में भी उर्दू का प्रयोग सरकारी काम काज वगैरह में इसका उपयोग हुआ करता था, आज भी कानूनी काम कागज में अक्सर हमको उर्दू के शब्द सुनने को मिल जाते हैं. भारत और पाकिस्तान के अलावा ये खाड़ी के देश मध्यपूर्व यूरोप अमेरिका कनाडा आदि देशों में जहाँ जहाँ भी हिंदी बोलने वाले लोग बस गए हैं वहां वहां उर्दू भाषा का इस्तेमाल किया जाता है.

भारत की जनगणना 2011 के मुताबिक भारत में लगभग 5 करोड़ 70 लाख लोग उर्दू भाषा का उपयोग अपने दिनचर्या में करते हैं। ये संख्या पाकिस्तान में हुए जनगणना 1981 के मुताबिक वहां उर्दू बोलने वाले लगभग 1 करोड़ 10 लाख तक है।

उर्दू कैसे लिखी जाती है

हिंदी, इंग्लिश और संस्कृत बाएं से दाएं ओर की तरफ लिखी जताई है जबकि उर्दू अरबी की तरह बाएं से दाएं की तरफ लिखी जताई है।

क्या आपको पता है की विश्व हिंदी दिवस कब मनाया जाता है 

शायर जिन्होने उर्दू का उपयोग किया

वो दौर था शायरों का और शायरी का और उस ज़माने के शायरों ने इस भाषा का उपयोग खूब किया। बोलने और सुनने में बहुत सुलभ और मीठी ज़ुबान है उर्दू और इसके शब्दों में वो लचक भी है जिसकी शायरी में ज़रूरत होती है। इस वजह से ये शायरों के बीच खूब पसंद की जाने लगी इतिहास में अगर जाएँ, तो हमें पता चलेगा की आमिर खुसरों ने इसका इस्तेमाल शुरू किया। शायरी में उसके बाद तो हर शायर ने अपनी अपनी शायरी में इसको इस्तेमाल किया।

उर्दू और उर्दू शायर

अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी को उर्दू क्लासिकी शायरी का स्वर्ण युग कहा जाता है। जब भाषा की मिठास अपने चरम सीमा पर थी। इस दौर के महान कवियों में मीर तक़ी मीर (नि0 1810), सौदा (नि0 1781), ख़्वाजा मीर दर्द (नि0 1784), इन्शा (नि0 1817), मुसहफ़ी (नि0 1824), नासिख़ (नि0 1838), आतिश (नि0 1847), मोमिन (नि0 1852), ज़ौक़ (नि0 1854) और ग़ालिब (नि0 1869) के नाम महत्वपूर्ण हैं। यह सभी मूल रूप से ग़ज़ल के कवि थे। मसनवी लिखने में मीर हसन (नि0 1786), दया शंकर नसीम (नि0 1844) और नवाब मिर्ज़ा शौक़ (नि0 1871) के नाम अहम हैं। नज़ीर अकबराबादी को महान लोककवि के रूप में जाना जाता है।

शोक गीत लिखने में अनीस (नि0 1874) और दबीर (नि0 1875) से आगे कोई नहीं निकल पाया है। ग़ालिब  जो अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फर के समकालीन थे उनको क्लासिक कवियों की कड़ी का अंतिम और आधुनिक युग का पहला कवि माना जाता है।

उर्दू में गद्य का आरम्भ अट्ठारहवीं शताब्दी में हुआ। ग़ालिब द्वारा लिखी गई चिट्ठियों से गद्य को ऊॅचा स्थान प्राप्त हुआ। उसके बाद सर सैय्यद अहमद खाँ (नि0 1898), मुहम्मद हुसैन आज़ाद (नि0 1910), हाली (नि0 1914) और शिबली (नि0 1914) ने उर्दू गद्य को ऊॅचाइयों तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा की।

उन्नीसवीं शताब्दी में श्रृंखलात्मक कहानियां जो कई हज़ार पृष्ठों और कई संस्करणों में प्रकाशित हुईं जैसे तिलिस्म-ए-होशरूबा और दास्तान-ए-अमीर हमज़ा (1881-1917) ने छोटी गद्य कथाओं जैसे बाग़-ओ-बहार (1802) और रजब अली बेग सोरूर की फ़साना-ए-अजाइब (1831) को फलने फूलने का रास्ता प्रदान किया।

उपन्यास लेखन का आरम्भ नज़ीर अहमद (1912), रतन नाथ सरशार (नि0 1902)और मोहम्मद हादी रूस्वा (नि0 1931) ने किया। ब़ीसवीं शताब्दी में प्रेमचंद ने उर्दू उपन्यास लेखन को शिखर पर पहुंचाने का कार्य किया। उनके द्वारा लिखित उपन्यास गोदान एक क्लासिक का दर्जा रखता है। सआदत हसन मन्टो (नि0 1955), की कहानियाँ, क़ुर्रतुल-ऐन-हैदर द्वारा लिखित आग का दरिया (1960), अब्दुल्लाह हुसैन की उदास नसलें (1963), राजेन्द्र सिंह बेदी की एक चादर मैली सी (1962) और इंतिज़ार हुसैन की बस्ती (1979) उर्दू साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण हैं।

उर्दू कवियों में अल्लामा इक़बाल (नि0 1938) बीसवीं सदी के सबसे महान कवि माने जाते हैं। इक़बाल के बाद एन0 एम0 राशिद (नि0 1975), मीराजी (नि0 1949), जोश मलीहाबादी (नि0 1982), फिराक़ गोरखपुरी (नि0 1982), फैज़ अहमद फैज़ (नि0 1984), मख़दमू मोहिउद्दीन (नि0 1969), और अख़्तर-उल-ईमान (1996) आदि महान कवियों की सूची में शामिल हैं।

अगर निबंध लेखन, ग़ैर-कथा साहित्य, साहित्यिक आलोचक और अध्येताओं पर नज़र डालें तो बाबा-ए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक़ (नि0 1961), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (नि0 1958), पतरस बुख़ारी (नि0 1958), महमूद शीरानी (नि0 1946), शेख़ मोहम्मद इकराम (नि0 1973), सैय्यद मोहम्मद अब्दुल्लाह (नि0 1986), मसूदहसन रिज़वी अदीब (नि0 1975), आबिद हुसैन (नि0 1978), कलीमुद्दीन अहमद (नि0 1983), एहतेशाम हुसैन (नि0 1972), मोहम्मद हसन असकरी (नि0 1978), इम्तियाज़ अली खान अर्शी (नि0 1981), काज़ी अब्दुल वदूद (नि0 1984), मालिक राम (नि0 1993), कन्हैया लाल कपूर (नि0 1980) और रशीद अहमद सिद्दीक़ी (नि0 1977) के नाम अहम हैं।

Article Source -www.urducouncil.nic.in

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